Sunday, October 7, 2007

शिरीष कुमार मौर्य

पुरानी हवाएं

चन्द्रकांत देवताले जी को याद करते हुए


मेरे साथ
बहुत पुराने दिनों की हवाएं हैं

मेरे समय में ये बरसों पीछे से आती हैं
और आज भी
उतनी ही हरारत जगाती हैं


मेरे भीतर की धूल को उतना ही उड़ाती हैं

बिखर जाती हैं
बहुत करीने से रखी हुई चीज़ें भी

क्या सचमुच
हवाएं इतनी उम्र पाती हैं?


विज्ञान के बहुश्रुत नियम से उलट
ये जिन्दगी की हवाएं हैं
हमेशा
कम दबाव से अधिक की ओर
जाती हैं!


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