Tuesday, October 16, 2007

येहूदा आमिखाई

आंखों की उदासी और एक सफ़र की तफसील


एक अँधेरी याद है
जिस पर चीनी के बुरे की तरह बिखरा हुआ है
खेलते हुए बच्चों का शोर वहाँ

वहाँ वे चीज़ें हैं
जो दुबारा कभी नहीं बचायेंगी तुम्हें
और वहीँ
मकबरों से ज़्यादा मज़बूत वे दरवाजें हैं

वहाँ एक सुरीली धुन है
जैसी कि काहिरा के मादी में
उन चीजों के वादे के साथ जिन्हें इस वक़्त की खामोशी
नसों के भीतर ही
रोके रहने की कोशिश करती है

और वहाँ एक जगह है
जहाँ तुम दुबारा कभी नहीं लौट सकते
दिन के वक़्त
एक पेड छुपाता है इसे
रात के वक़्त
एक लैंप की रोशनी चमकाती है

मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं कह सकता
मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं जानता

भूलने और खुश होने के लिए
खुश होने और भूलने के लिए
इतना ही बहुत है

बाकी तो सब आंखों की उदासी है
और एक सफ़र की तफसील !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
संवाद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ' धरती जानती है ' में संकलित

1 comment:

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