Sunday, October 14, 2007

कू सेंग












अब बच्चा


अब बच्चा
कुछ देख रहा है
कुछ सुन रहा है

कुछ सोच रहा है

क्या वह देख रहा है
उस तरह की चीज़ों को जैसी देखी थीं मोहम्मद ने
एक पहाड़ी गुफा में
खुदा के इलहाम के बाद?

क्या वह सुन रहा है
उन आवाज़ों को
जिन्हें नाज़रेथ के जीसस ने
अपने सिर के ऊपर बजते सुना था

जब उसका बपतिस्मा हुआ था
जार्डन के किनारे?

क्या वह खोया है
विचारों में
जैसे शाक्यमुनि खोये थे बोधिवृक्ष के नीचे?

नहीं!
बच्चा इसमें से कुछ भी नहीं
देख

सुन
और सोच रहा है

यह तो देख

सुन
और सोच रहा है
ऐसा कुछ जिसे कोई दूसरा देख

सुन
और सोच नहीं सकता

कुछ ऐसा
कि मानो एक शांत ओर अनोखा आदमी होने के नाते
ये अकेला ही ले आएगा
बहार
इस दुनिया में
सिर्फ अपने ही दम पर

तभी तो
यह मुस्करा रहा है

एक प्यारी-सी मुस्कान !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
पुनश्च द्वारा प्रकाशित काव्यपुस्तिका से

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