Thursday, October 11, 2007

शिरीष कुमार मौर्य

गैंगमेट वीरबहादुर थापा

बहुत
शानदार है यह नाम
और
थोड़ा अजीब भी
एक ही साथ जिसमें वीर भी है
और बहादुर भी

यहां से आगे तक २२.४ किलोमीटर सड़क
जिन मजदूरों ने बनायी
उनका उत्साही गैंग लीडर रहा होगा ये या कोई उम्रदराज मुखिया
लो.नि.वि. की भाषा
बस इतनी ही समझ आती है मुझे


दूर नेपाल के किन्हीं गांवों से आए मजदूर
उन गांवों से
जहां आज भी मीलों दूर हैं सड़कें
यों वे बनायी जाती रहेंगी हमेशा
लिखे जाते रहेगे कहीं-कहीं पर उन्हें बनाने के बाद
ग़ायब हो जाने वाले
कुछ नाम

१९८४ में कच्ची सड़क पर डामर बिछाने आए वे बांकुरे
अब न जाने कहां गए
पर आज तलक धुंधलाया नहीं उनके अगुआ का
ये नाम

बिना यह जाने
कि किसके लिए और क्यों बनायी जाती हैं
सड़कें
वे बनाते रहेंगे उन्हें
बिना उन पर चले
बिना कुछ कहे

उन सरल हृदय अनपढ़-असभ्यों को नहीं
हमारी सभ्यता को होगी
सड़क की ज़रूरत
बर्बरता की तरफ़ जाने के लिए

और बर्बरों को भी

सभ्यताओं तक आने के लिए


गिद्ध

किसी के भी प्रति उनमें कोई दुर्भावना नहीं थी
वे हत्यारे भी नहीं थे
हालांकि बहुत मजबूत और नुकीली थी उनकी चोंच
पंजे बहुत गठीले ताकतवर
और मीटर भर तक फैले उनके डैने

वे बहुत ऊंची और शान्त उड़ानें भरते थे
धरती पर मंडराती रहती थी उनकी
अपमार्जक छाया

दुनिया भर के दरिन्दों-परिन्दों में उनकी छवि

सबसे घिनौनी थी

किसी को भी डरा सकते थे उनके झुर्रीदार चेहरे
वे रक्त सूंघ सकते थे
नोच सकते थे कितनी ही मोटी खाल
मांस ही नहीं
हडि्डयां तक तोड़कर वे निगल जाते थे

लेकिन
वे कभी बस्तियों में नहीं घुसते थे
नहीं चुराते थे छत पर और आंगन में पड़ी
खाने की चीजें
वे पालतू जानवरों और बच्चों पर कभी नहीं झपटते थे
फिर भी हमारे बड़े
हमें उनके नाम से डराते थे
बचपन की रातों में अपने विशाल डैने फैलाये
वे हमारे सपनों में आते थे

बहुत कम समझा गया उन्हें इस दुनिया में
ठुकराया गया सबसे ज्यादा
जिन्दगी का रोना रोते लोगों के बीच
वे चुपचाप अपना काम करते रहे
धीरे-धीरे सिमटती रही उनकी छाया
बिना किसी को मारे
बिना किसी दुर्भावना के
मृत्यु को भी उत्सव में बदल देने वाली उनकी
वह सहज उपस्थिति
धीरे-धीरे
दुर्लभ होती गयी

हालांकि

उनके बिना भी बढ़ता ही जायेगा जिन्दगी का ये कारवां
लेकिन उसके साथ ही
असहनीय हाती जायेगी
मृत्यु की सड़ांध

हमारी दुनिया से

यह किसी परिन्दे का नहीं
एक साफ-सुथरे भविष्य का
विदा हो जाना है।

ये दोनो कविताएं हंस के 2005 अप्रैल अंक में छप चुकी हैं।

2 comments:

  1. बिना किसी को मारे
    बिना किसी दुर्भावना के
    मृत्यु को भी उत्सव में बदल देने वाली उनकी
    वह सहज उपस्थिति
    धीरे-धीरे
    दुर्लभ होती गयी

    Waah!

    ReplyDelete

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