Sunday, October 7, 2007

नाज़िम हिकमत की कविता

इस बार वाया मंगलेश डबराल

स्त्रेस्नाय चौराहा

स्त्रेस्नाय चौराहे का गिरिजाघर बजाता है चार का गजर
हालांकि चौराहा और गिरिजाघर बहुत पहले उजड़ गए हैं

और उनकी जगह अब तान दिया गया है शहर का सबसे बड़ा सिनेमाघर
और वहाँ मैं मिलता हूँ उन्नीस वर्ष के नौजवान खुद से
उसे पहचान लेता हूँ फौरन बिना किसी अचरज के उसका फोटो तक देखे बग़ैर
हम बढाते हैं अपने हाथ लेकिन वे मिल नहीं पाते
चालीस वर्षों के आरपार
असीम समय - आर्कटिक समुद्र

बर्फ गिरने लगी है यहाँ स्त्रेस्नाय चौराहे पर
जिसका नाम अब पुश्किन चौराहा है
काँप रहा हूँ मैं ठिठुर गए हैं मेरे हाथ-पैर
हालांकि मैं पहने हुए हूँ ऊनी मोज़े और फरदार दस्ताने
बल्कि वही है मोजों और दस्तानों के बग़ैर
जूते फटे हुए चीथड़ों में पैर
उसकी जीभ पर एक खट्टे मांसल सेब की तरह है उम्र
अट्ठारह साल की एक किशोरी के पुष्ट स्तनों पर हैं उसके हाथ
उसकी आंखों में मीलों लंबे गीत हैं
और मृत्यु है बस छः फुट
और उसे नहीं मालूम क्या है उसके भविष्य के भीतर
वह तो मैं ही जानता हूँ उसका भविष्य
क्योंकि मैंने जिए हैं वे सभी विश्वास जिन्हें जियेगा वह
मैं उन शहरों में रह चुका हूँ जहाँ रहेगा वह
मैं उन औरतों से कर चुका हूँ प्रेम जिनसे करेगा वह
मैं सो चुका हूँ उन जेलों में जहाँ सोयेगा वह
मैं झेल चुका हूँ उसकी तमाम बीमारियाँ
उसकी तमाम नींदें सो चुका हूँ
देख चुका हूँ उसके तमाम स्वप्न
आखिरकार वह खो देगा सब कुछ
जो मैंने खोया है जीवन भर !

2 comments:

  1. बहुत अच्छा है पर हल्लू-हल्लू छापो भाई.....

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