Wednesday, October 3, 2007

आलोक धन्वा

आलोक धन्वा की छोटी कविताएं


मुझे आलोक धन्वा को पढना हमेशा ही अच्छा लगता है। उनकी लम्बी कवितायेँ हमेशा चर्चा के केंद्र में रही हैं और इसके चलते उनकी कुछ बेहद कलात्मक छोटी कविताओं की अनदेखी हुई है । यहाँ प्रस्तुत हैं मेरी पसंद की कुछ छोटी कवितायेँ - कवि के प्रति आभार के साथ ......
***

पहली फिल्म की रोशनी


जिस रात बाँध टूटा
और शहर में पानी घुसा

तुमने खबर तक नहीं ली

जैसे तुम इतनी बड़ी हुई बग़ैर इस शहर के
जहाँ तुम्हारी पहली रेल थी
पहली फिल्म की रोशनी
***

आस्मां जैसी हवाएं

समुद्र
तुम्हारे किनारे शरद के हैं

और तुम स्वयं समुद्र सूर्य और नमक के हो

तुम्हारी आवाज़ आंदोलन और गहराई की है

और हवाएं
जो कई देशों को पार करती हुई
तुम्हारे भीतर पहुंचती हैं
आसमान जैसी

तुम्हें पार करने की इच्छा
अक्सर नहीं होती
भटक जाने का डर बना रहता है !
***

शरद की रातें

शरद की रातें
इतनी हल्की और खुली
जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक

जैसे इन शामों की रातें होंगी
किसी और मौसम में
***

सूर्यास्त के आसमान

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सडकों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रौशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे जानी -पह्चानी आवाजें

कभी लिखेंगें कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह!
***

पक्षी और तारे

पक्षी जा रहे हैं और तारे आ रहे हैं

कुछ ही मिनटों पहले
मेरी घिसी हुई पैंट सूर्यास्त से धुल चुकी है

देर तक मेरे सामने जो मैदान है
वह ओझल होता रहा
मेरे चलने से उसकी धूल उठती रही

इतने नम बैंजनी दाने मेरी परछाई में
गिरते बिखरते लगातार
कि जैसे मुझे आना ही नहीं चाहिए था
इस ओर !
*** 

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