Saturday, September 19, 2020

सहूलियात के विरुद्ध अदावतों के इलाक़ों में - विष्‍णु खरे (दूसरे स्‍मृति-दिवस पर विशेष) - सौजन्‍य : कुमार अम्‍बुज

विष्‍णु खरे की दूसरी पुण्‍यतिथि है। किसी भी दौर में भाषा और समाज की कविता समग्रता में केवल एक कवि की ऊर्जा से संचालित नहीं होती, वह कई सहयात्रियों की यात्रा है, लेकिन कहना ही होगा कि विष्‍णु खरे के बिना हमारी हिन्‍दी का कविता का संसार कुछ बेरंग हुआ है। कहते हैं कविता पूरा जीवन मॉंगती है, विष्‍णु खरे ने यह उसे दिया। वे लगभग पूरा जीवन हिन्‍दी की चंद सहज उपलब्‍ध सहूलियात के विरुद्ध अपनी ही चुनी हुई कुछ अदावतों के इलाक़ों में बसे रहे। उन्होंने सदा ही हिन्‍दी कविता की भीतरी राजनीति और उठापटक में एक पलीता लगाए रखा, वे जब चाहते विस्‍फोट कर देते। उनके जाने के बाद से ही उन्‍हें लेकर हिन्‍दी में अच्‍छी-ख़ासी हलचलें हैं। लोग उन्‍हें अच्‍छे-बुरे में याद करना नहीं भूलते। अभी युवा कवि और रंगकर्मी व्‍योमेश शुक्‍ल उन पर एक किताब लिख रहे हैं, जिसके कुछ शानदार अंश हमने फेसबुक पर पढ़े हैं। आज वरिष्‍ठ कवि कुमार अम्‍बुज ने चंद्रकांत पाटील के सौजन्‍य से अरुण काले की एक कविता का अनुवाद अनुनाद को सौंपा है। अनुवाद के पीछे एक प्रसंग है, जो विष्‍णु खरे के स्‍वभाव के एक दिलचस्‍प पहलू को खोलता है। जिस जगह, जिस परिस्थिति और जिस कार्यक्रम में जैसी कविता मंच पर एक अनन्‍त ऊब में बैठे-बैठे उन्‍होंने अनुवाद के लिए चुनी, उसमें हमारे समाज और कविता के वे खोखल मौजूद हैं, जिनमें मुँह डालकर बोलते हुए विद्वज्‍जन अकसर ही बहुत अश्‍लील सुनाई देते हैं।

 

हम यह प्रसंग और अनुवाद कुमार अम्‍बुज के प्रति कृतज्ञ होते हुए अपने पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं।    

- शिरीष मौर्य 

 

 (तस्‍वीर सौजन्‍य : भरत तिवारी)

   अनुवादक विष्‍णु खरे   

 

यशस्‍वी कवि विष्‍णु खरे का अनुवादक रूप ध्‍यातव्‍य रहा है।  उन्‍होंने शिंबोर्स्‍का, मिवोश, अत्तिला योझेफ़, मिक्‍लोश राद्नोती सहित दर्ज़न भर कवियों की कविताओं के पुस्‍तकाकार अनुवाद किए हैं। कालेवाला महाकाव्‍य का छांदिक अनुवाद संभव किया और फ़‍िनलैंड में सम्‍मानित हुए। उनके द्वारा अनूदित कविताएँ काव्‍याशय की श्रेष्‍ठता और गुणवत्‍ता के लिए भी याद की जाती हैं। उनके अनुवादक पर तो विस्‍तार से पृथक बातचीत हो सकती है।

 

बहरहाल, उनके यहाँ एक आशु अनुवादक होने का छोटा-सा रोचक प्रसंग है। यह प्रसंग मराठी के मूर्धन्‍य कवि, आलोचक, अनुवादक और विष्‍णु जी के अनन्‍य मित्र श्री चंद्रकांत पाटील के सौजन्‍य से प्राप्‍त हुआ है।

 

अगस्‍त 2008 में मराठी के चर्चित आदिवासी कवि भुजंग मेश्राम के कविता संग्रह 'अबूझमाड़' और ख्‍यात दलित कवि अरुण काले के कविता संग्रह 'ग्‍लोबलचे गाँवकुस', इन दो मराठी कविता संग्रहों के शामिल विमोचन कार्यक्रम की अध्‍यक्षता विष्‍णु खरे कर रहे थे। लोकवांग्ङमय प्रकाशन, मुंबई के इस आयोजन में विमोचन भी विष्‍णु जी को ही संपन्‍न करना था। मंच पर उनके एकदम करीब मुख्‍य वक्‍ता की भूमिका में चंद्रकांत पाटील भी बैठे थे, जिन्‍होंने भुजंग मेश्राम का संग्रह संयोजित और संपादित किया था।


अरुण काले की एक कविता का विष्‍णु खरे ने, किसी अंतराल में मंचीय ऊब से निजात पाने के लिए, वहीं बैठे-बैठे तत्‍काल, मराठी से हिंदी में अनुवाद किया और बग़लगीर चंद्रकांत पा‍टील जी को थमा दिया कि अब तुम्‍हें इसका जो करना हो करो। यह अनुवाद का काग़ज़ पाटील जी के पास कि़ताबों में दबा रह गया और उन्हें संयोगवश अभी बरामद हुआ। विष्‍णु खरे की हस्‍तलिपि में होने से भी इस अनुवाद का अपना एक महत्‍व है।

 

आज विष्‍णु खरे जी की दूसरी पुण्‍यतिथि पर इसे देखना, पढ़ना उनकी स्‍मृति के इस रूप को भी ताज़ा कर सकता है। 

-कुमार अम्बुज

 


   मैं गया था रिलेशन बनाने  

(अरुण काले की कविता : अनुवाद -विष्‍णु खरे)

 

स्‍टेशन पर जीप भिजवाई थी

ड्राइवर हाथ में नामवाला गत्‍ता लिए खड़ा था

पहचान बतलाते ही लपककर उसने बैग लिया

सफ़र में कोई परेशानी तो नहीं हुई ?

 

मैंने सिर्फ़ उसका नाम पूछा

वैसी प्रथा ही है

प्रांगण में जगमग सूटबूटधारी कार्यकर्ता

गुलदस्‍ता देकर मुस्‍कराते हुए

स्‍वागत है बोले

फ़ैश हो जाइए! वॉश लीजिए!

मैंने कहा : बाथ ही लिए लेता हॅूं

 

साबुन, बाथरूम व तौलिए का थोड़ा ही इस्‍तेमाल किया

जैसे फोटो खींची जा रही हो, रिस्‍क क्‍यों लेना

चाय आधी बिना पिये ही रख दी

रूम सर्विस को थैंक्‍स कहा

शक्‍कर के प्रति अरुचि प्रदर्शित की

 

चिंतन, मनन और आराम के वक्‍़त

झपकी लग गई, समय कम पड़ गया

 

छोटे पॉश हॉल में कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ


एनजीओ की ओर से स्‍वागत किया गया

आज का कार्यक्रम दलित कवि के लिए निश्चित था

और आपको यह लाभ उपलब्‍ध हुआ

 

ज़ोरदार कविताऍं सुनाईं

ग्रेट! ग्रेट! अरे ग्रेट!

कवितापाठ समाप्‍त हुआ

तालियॉं बजाते हुए रसिकजन उठे    

महिलाओं ने मेरी पत्‍नी के बारे में पूछा

 

सबने खटाखट गिलास उठाए

मेरे लोग इसीलिए बदनाम हैं

मेरे लिए छोटा ही बनाइएगा, हॉं!

दौर शुरू हुआ बीच-बीच में मेरी ओर ध्‍यान

फिर अपनी गपशप

 


अपनी तो लिमिट हो गई, अध्‍यक्ष ने डिनर का कॉल दिया 

सब एकाग्रता से भोजन पर जुट गए

भुक्‍खड़पना न दिखाते हुए छोटे छोटे चार पीस खाए 

नैपकिन से ओंठ पोंछे


बिज़ी शेड्यूल है, सॉरी!

हाथ में लिफ़ाफ़ा देकर आभार माना 

खाली पेट रात में नींद आई नहीं 


सुबह रूम सर्विस ने कहा, 'जल्‍दी करो!' 

चैक आउट टाइम नौ बजे का है 

चाहिए तो ऑटो रिक्‍शा लाके देंगे 

****  

(मूल मराठी से विष्‍णु खरे द्वारा 27 अगस्‍त 2008 को अनूदित) 

 

Thursday, September 17, 2020

तब केवल उम्मीदों में होते हैं बीज और बारिश - राकेश मिश्र की कविताऍं


राकेश मिश्र जी की कविताओं में गाँव है, वहां की पगडंडी है, प्रकृति हैप्रेम हैआम आदमी और मेहनतकशों के प्रति गहरी संवेदना है। कवि के पास जीवन के सौंदर्य को देखने परखने  का एक ख़ास नजरिया है. बहुत ही सहज सरल और जनतांत्रिक भाषा है. वह बिना किसी लाग-लपेट के बहुत समर्थ काव्य भाषा में लगातार कविताएँ रच रहे हैं. उनकी छोटी-छोटी काव्य पंक्तियाँ भी बहुत सहजता से पाठकों को प्रभावित करती हैं. जैसे वह लिखते हैं ‘प्रेम में शब्द ही / असगुन हैं / चुप ही / शुभ-यात्रा’.

इन कविताओं में एक तरफ नवम्बर की हल्की ठंड जैसी कोमल भावों की कविताएं हैंदूसरी तरफ उस आखिरी आदमी की चिंता है, जिसका जीवन दो वक्त की रोटी के संघर्षों में बीत रहा है. ‘जब कोई गरीब / सोचकर अपना भविष्य / उदास हो / तो बेचैन होनी चाहिए / तुम्हारी नींद’ आम आदमी की जद्दोजहद और उससे उपजी बेचैनी उनकी कविताओं में बार-बार आती है.
उनके यहाँ जीवन की उदासी के बीच उमंग भी कम नहीं है. वह अँधेरे के बीच भी कोई रोशनी खोज लाते हैं . हताशा-निराशा के बीच भी वह थोड़ी सी उम्मीद बचा लेते हैं.. उम्मीद की यह किरण इन कविताओं में तो है ही, उनके कविता संग्रहों की अन्य कविताओं से गुजरते हुए भी जगह-जगह दिखाई देती है।

इन कविताओं का मंतव्य बहुत स्पष्ट है. इन्हें पढ़ते हुए एक रचनाकार की आन्तरिक बेचैनी को लगातार महसूस किया जा सकता है.
- संदीप तिवारी 
(युवा कवि)

  भाव  

भाव
मंदिरों में मूर्ति बनकर
भगवान हो गये

भाव
दुर्गम राहों पर चलकर
तीर्थ बन गये

भाव
घर से निकल कर
बुद्ध बन गये

भाव
प्रार्थना में रहकर
चिड़ियों के गीत बन गये।

  हड्डियों के पुल  


पहले
रूप ही गलता है
समय की पतीली में
हडियों के पुल तो
सदियाँ गुजरने का
इंतज़ार करते हैं ।


  दाढ़ी  


रोज
बढ़ जाते हैं
वृक्षों की कोपलें,
घास की फुनगियाँ,
उत्तर का पहाड़
और
मेरी दाढ़ी
मेरा शेव करना
रोज़
गहरा कर देता है
मेरा विश्वास कि
मैं जीवित हूँ ।

  तुम्हारा जाना  


तुम्हारा
चले जाना
अचानक ही
निःसंकेत
वही खुशबू का गलियारा था
हवा की परतों में
थोड़ी देर तक
धूल वैसी ही रही
निःशब्द श्वेताकार
थोड़ी देर तक
मैं लौटना चाहता था
पर नहीं खुले
स्मृति-रन्ध्र
मैं खड़ा ही रहा !

  प्रेम  


अचर्चित प्रेम ही
जीता है
जन्म जन्मान्तर
प्रेम की चर्चा से
अकाल मरते हैं
प्रेमी
प्रेम में शब्द ही
असगुन हैं
चुप ही
शुभ-यात्रा है
प्रेम की ।

  जीना  


जब कोई गरीब
पसीने से लथपथ
नृत्य करे
तो थिरकने चाहिए
तुम्हारे पॉंव
जब कोई गरीब
सोचकर अपना भविष्य
उदास हो
तो बेचैन होनी चाहिए
तुम्हारी नींद
जब कोई गरीब
सो गया हो खाली पेट
आज रात
तो मर जानी चाहिए
तुम्हारी भूख
तभी जी सकोगे तुम
औरों के संग । 

  नवम्बर में  

नवम्बर में
जल्दी आने लगती हैं
शामें
चने और मटर के बीज
मिट्टी में
अंकुरित होने को होते हैं
गन्ने में शेष होती है
मिठास की आमद
नवम्बर की उन्हीं शामों में
खिलखिला कर हँस पड़ती हैं
खेतों से घर लौटती
लड़कियाँ
उनकी हँसी की खिड़कियों से
आहिस्ता दाखिल होती है
गुलाबी सर्दी
बालिश्‍त भर रोज़
लम्बी होती रातों में
उचटी नींदों वाले
लालटेन की मद्धिम रोशनी के सहारे
दीवाल की मिट्टी से
गड़े हुए आइनों में
अपनी रेखें निहारते लड़कों के
सपनों में बस जाती हैं
लड़कियों की समवेत खिलखिलाहट
गाँव का सूरज प्रतीक्षा करता है
हर सुबह
लड़कों के नींद से उठने की
मिलन और सम्भावनाओं के
गीत होते हैं
नवम्बर के दिन
गाँव के लड़कों की
क्या दिन क्या रातें
सब गुलाबी हो जाते हैं
नवम्बर में ।

  कई बार  


कई बार
रंग होता है
रूप होता है
आत्मा नहीं होती
प्रेम होता है
देह होती है
प्रेमी नहीं होते
भाव होता है
शब्द होते हैं
अर्थ नहीं होता
बात होती है
विचार होते हैं
निष्‍कर्ष नहीं होता
मैं होता हूँ  
तुम होती हो
जिन्दगी नहीं होती
पद होता है
प्रतिष्‍ठा होती है
निष्‍ठा नहीं होती
देश होता है
राजा होते हैं
शान्ति नहीं होती । 
कई बार  

  रास्ते  


सपनों में
नहीं पूरते रास्ते
मैं चलता रहता हूँ
रास्ते में पूछता हूँ
किसी अनजान अपने जैसे से
अपने गाँव का सही रास्ता
वह बताता है
मेरे गाँव पाँच सड़कें जाती हैं
सभी चौड़े राजमार्ग हैं
चलते रहो
मुझे केवल बियाबान दीखते हैं
मैं चलता रहता हूँ
जहाँ तक देख सकता हूँ
बियाबानों से सड़के गुजर रही हैं
कोई शहर नहीं
दूध जलेबी नहीं
प्यास से जाग जाता हूँ
पानी पीकर सोता हूँ
इस बार कोई नई सड़क है
मेरे गाँव जाने के लिए
फिर पूछता हूँ
किसी अनजान अपने जैसे से
क्या मेरे गाँव की यही सड़क है
वह कहता है
तुम्हारे गाँव की पाँच सड़कें हैं
सभी नापनी होगी तुम्हें
तभी पहुँचोगे गाँव
मेरा स्वप्न टूट जाता है ।


  हत्यारे  

मैं चला जा रहा था
अकेला
अचानक ही मैं
एक भीड़ से गुजरा
जैसे विमान उड़ता हुआ
बादलों के विक्षोभ से गुजरता है
दबाव था
पर रास्ता नहीं बदलना पड़ा
मैं चुपचाप निकल गया
बीच से
फिर कुछ दूर जाकर
कहकहों की आवाजे सुनीं
मैंने खुद को देखा
मेरे कई अंग गायब थे
जगह-जगह रक्त रिसने लगा था
मेरी देह से
मैं समझ नहीं सका था
कि मैं हत्यारों की
नई नस्ल से गुजरा था
जो खत्म नहीं करती
वजूद
केवल छीन लेती है जरूरी चीजें।  


  जो निराशा  

जो निराशा
पीड़ा
सुख है
अभी है
फिर कभी नहीं है
मैं कुछ नहीं करता
जब कुछ भी नहीं हो रहा होता है
जुते खेतों में
खुली होती है
धरती की कोख
तब केवल उम्मीदों में होते हैं
बीज और बारिश
गर्म होती है
मिट्टी की देह
मिट्टी में घुलती वर्षा बूँदे
फैल जाती हैं
मिट्टी की गंध शिराओं में
तारे देख रहे होते हैं
मिट्टी की तैयारी
जब लहलहा उठेगी
धरती
तब एक घनी गहरी
उब से उठकर
मैं भी पड़ा होऊँगा
मिट्टी में
पूरी जीवंतता के साथ ।


  तेरा-मेरा  

तेरा मेरा
रूप अलग है
सुख एक है
तेरा मेरा
कारण अलग है
दुःख एक है
तेरे मेरे
शहर अलग हैं
इन्तजार एक है
तेरी मेरी
आँखे अलग है
दृश्य एक है
तेरा मेरा
चेहरा अलग है
भाव एक है
तेरी मेरी
कारा अलग है
अपराध एक है


  कविता किताबें  

रखो
कुछ कविता - किताबें
घर में
हर रोज आयेंगे
तुमसे मिलने
कुछ शब्द, कुछ सपने
कुछ रंग, कुछ रास्ते
कुछ बादल, कुछ पंक्षी
हर रोज आयेंगे !


  महानगर  


इन्हीं भव्य इमारतों में
जिन्दा दफन है
पहाड़ का अंतस
नदी की आत्मा
वृक्षों का बसन्त
और
मजदूर की दिहाड़ी ।


  अंधेरे की कविता  


बासी खाना भी
किसी न किसी की
भूख मिटाता है
सड़ा मांस भी
कोई न कोई
खा जाता है
अंधेरों का इन्तजार
कईयों को रहता है
अंधेरा
किसी न किसी को
खाता है
रोशनी के झरोखे
हर ओर हों
जरूरी नहीं
अंधेरा
अपनी जगह ही
आता है ।
***


  परिचय  

राकेश मिश्र
9205559229
538 क/90 विष्‍णु लोक कालोनी
मौसम बागत्रिवेणी नगर 2 
सीतापुर रोडलखनऊ0प्र0,
226020
पूर्व प्रकाशित कृतियांं
1- चलते रहे रात भर
2- जिन्‍दगी एक कण है
3- अटक गयी नींद
(राधाकृष्‍ण प्रकाशन) 

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