Thursday, July 9, 2020

गूँगी नहीं हो जाती है आत्मा - प्रदीप सैनी की कविताऍं

समकालीन हिन्‍दी कविता की अन्‍तर्धारा में प्रदीप सैनी सदा ही धैर्य और संयम के साथ रचनारत दिखायी दिए हैं। अनुनाद को उनकी ये अप्रकाशित कविताऍं मिली हैं। प्रेम को अवश्‍य ही कविता में अनगिन बार कहा गया है और अनगिन बार कहा जाएगा, किन्‍तु पाठकों को यहॉं आत्‍मा के मुँह में घुलती गुड़ की डली के स्‍वाद जैसी इसकी मौलिकता कुछ अलग अनुभव सरीखी लगेगी। 

अनुनाद पर कवि का स्‍वागत है और इन कविताओं के लिए शुक्रिया भी। 
                           
कवि का कथन 

मेरे लिए कविता अपने भीतर की बेचैनियों, चिंताओं और झटपटाहटों को पकड़ने की यात्रा है। वे क्या हैं और क्यों हैं ? मेरे लिए इसका जवाब खोजना दरअसल अपनी खोज के साथ-साथ उस सत्ता, संस्कृति और समाज की भी जांच पड़ताल हैं जिससे रोज़ मेरा पाला पड़ता है। इस यात्रा में सच्चाई और अपने प्रति निर्मम ईमानदारी ही मेरी लालटेन रही है।

जीवन में जिया हुआ तमाम झूठ, फ़रेब, कायरताएँ और सुविधाजनक समझौतों की स्वीकारोक्ति के लिए मैंने कविता को एक कॉन्फेशन बॉक्स की तरह भी बरता होगा, इससे इंकार नहीं कर सकता। लेकिन मेरे लिए कविता सिर्फ़ इतनी ही नहीं है। उसमें मुझसे बाहर की एक दुनिया भी है। मेरी समाज, देश और दुनिया को लेकर चिंताएं भी उनमे शामिल हैं।  लेकिन किसी एजेंडे के तहत या उसके दबाव में मैंने कविताएं कभी नहीं लिखीं और न ही पॉलिटिकली करेक्ट होने को किसी अनिवार्य शर्त की तरह देखा।

अपनी बात को कहने के लिए मेरे पास कविता से बेहतर कुछ भी नहीं। यहाँ भी अपने वक्तव्य को अपनी दस साल पहले लिखी एक अप्रकाशित कविता से विराम देता हूँ।

बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ ?
[कवि नागार्जुन को याद करते हुए]

यूँ तो जब भी लिखता हूँ कविता की पंक्ति कोई
दाएँ हाशिए को वह छूती नहीं कभी
पर बाँई तरफ़ करता हूँ कहाँ से शुरू लिखना
यह भी तो तय नहीं

न फक्कड़ हूँ न घुम्मकड़
एक जगह जमकर फैला रहा हूँ जड़ें गहरी
दूर दूर तक बना रहा हूँ पहुँच
सोख लेना चाहता हूँ
अपने हिस्से से ज्यादा खनिज और पानी

बाबा
साफ़ साफ़ सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़
कभी हकलाते नहीं हो तुम
तुम्हारी आवाज़ में शामिल जो हैं
बहुत सी आवाज़ें गुमनाम
खुद वक़्त की खोई हुई आवाज़ भी
पाती है शरण उसमें

मेरी आवाज़ में तो बाबा बस मेरा अपना ही शोर है

जिस प्रेम को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल कर
कविता में बदल देता हूँ
उसे सब से छुपाकर एक गुनाह की तरह जीता हूँ
कठिन समय में करता हूँ प्रेम
कमाल यह है कि कविताएँ लिखने के लिए
बचा रहता हूँ

सौ झूठ जीता हूँ
शुक्र है इतना कि कविता में सिर्फ सच लिखता हूँ

धूल भरे मौसमों में
मैली हुई आत्मा को धोने
कविता में लौटता हूँ बार-बार
हर बार गंदला करता हूँ उसका जल

बाबा, ये मैं कैसा कवि हूँ

इतना पवित्र था कि प्रेम ही हो सकता था

        1.

यह पिछली सदी के
उम्मीद भरे आख़िरी दिनों की बात है
सदी बदलने से तो यूँ बदलने वाला कुछ नहीं था
पर तुम अचानक मिली जब मुझे
यक़ीन हो चला था
आने वाले समय में बेहतर होगी दुनिया
विलुप्त हुई नदियाँ
दन्तकथाओं से निकल धरती पर बहेंगी
बारूद सिर्फ़ दियासिलाई बनाने के काम आएगा
और ऐसे ही न जाने कितने सपनों ने
आँखों में घोंसला बना लिया था
मैं साफ़-साफ़ नहीं देख पाता था वक़्त।
         2.
तुम किसी आदिम प्यास के स्वप्न में
मेरे भीतर की बावड़ी तक
अनजाने ही आ गईं थीं
वहां इतना निथरा  था जल
यक़ीनन उसमें तुम
रूप अपना ही देख मुग्ध हुईं 
वरना पास तुम्हारे वहां आने और बैठ जाने की
वाजिब कोई वजह मौजूद नहीं थी

तुम्हारा आना इतना अप्रत्याशित था
मैं नहीं जानता था
किस नाम से पुकारूँ तुम्हें
तुम्हारी गंध को पहले-पहल मैंने
खुशनुमा जंगल की देन समझा
हड़बड़ाहट में मेरे बहुत ज्यादा बोलने के बाद भी
तुम कुछ भी सुन नहीं पाईं
जानता ही  कहाँ था मैं तब स्पर्श की भाषा।

         3.
अपने लिए हल्की तरफ़दारी के साथ ही सही
आज भी याद है मुझे सब
और इस बीच दस बरस बीत गए हैं
और प्रेम किसी वायरस की तरह चिन्हित किया जा चुका है
बचाव के लिए हम सभी
खुद को स्मृतिहीन बना रहे हैं
कि कहीं दर्ज़ न हो पाएं
एक काँपते हुई पल के थमे हुए रंग
कोई ऐसी ध्वनि जो गूँजती रहे ताउम्र
और काया से परे का कोई स्पर्श
बाक़ी सब भी मिटाए जाने की सहूलियत के साथ
कुछ गीगाबाइट मेमोरी के हवाले रहे

सभी बदल रहे हैं लगातार
प्रेम नहीं
वह आज भी आपको नष्ट करने की क्षमता रखता है
बावजूद इसके कि हम सभी
अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में लगे हैं।

         4.
इन दस बरसों में
सभी दस अंकों की एक संख्या में तब्दील हो गए हैं
लगातार चल रहा है
असंख्य संख्याओं के बीच
जमा-घटाव-गुणा-भाग
एक संख्या दूसरी से इतना बतियाती है
जैसे अभी-अभी ईजाद हुई हो भाषा
ख़ुदा का शुक्र था
जब हम मिले संवाद कम चुप्पियाँ ज़्यादा बोलती थीं।

         5.

उस वक़्त मेरे भीतर
सिर्फ़ कविताएँ थीं
रगों में खून नहीं स्याही दौड़ती थी
और कविताएँ धीरे-धीरे ही सही
हमारे बीच पुल बन गईं थीं
उनसे होकर हम आ-जा सकते थे
एक दूसरे के भीतर

कविताएँ तुम भी लिखती थीं
अब नहीं लिखती होगीं
सफ़ेद पड़ चुके हल्के गुलाबी रंग वाली स्मृतियों के साथ
उन्हें भी छोड़ दिया होगा तुमने
जैसे दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से पहले
पर्वतारोही आधार शिविर में छोड़ देता है
अगले सफ़र के लिए गैर-जरूरी हो गया
बहुत-सा सामान ।

         6.

मुझसे बरस दो बरस उम्र में
छोटा होने के बावजूद
कितना समझदार थी तुम
जान लिया था कि नहीं जिया जा सकता उसके साथ
जो हमारे बीच
इतना पवित्र था कि प्रेम ही हो सकता था।

         7.

तुम्हारा जाना मेरे लिए
गहरी नींद से जगकर आँखें मलने जैसा था
मैंने दुनिया को नई नज़र से देखा

इन दस बरसों में
कठिन अभ्यास से अर्जित की है मैंने
सामने घटित होते हुए को न देख पाने की दृष्टि
सिर्फ़ उन आवाज़ों को पहचानने का हुनर
जो मेरे पक्ष में हैं
या जिन्हें मेरे पक्ष में किया जा सकता है
और भाषा का वह तिलिस्म
जिससे अपनी आत्मा के सिवा
सभी को छला जा सकता है

हो सकता है किसी रोज
तुम मेरे सामने से गुजरो
और मैं तुम्हें देखूं एक अपरिचित मुस्कान के साथ।

पार करना

तुम मेरे जीवन में नदी की तरह आईं 
मुझे तुम में डूब जाना था

अभागा हूँ मैं
आगे की यात्रा के लिए प्रार्थनाएं बुदबुदाते हुए
मैंने तुम्हें एक पुल से पार किया।


एहतियात

ताज़ा ताज़ा प्रेम अभी गीला है
रच जाने दो इसे दिल की दीवार पर

छुओ मत
दूर रखो तन

वरना इस  पर पड़ेंगे धब्बे
और तुम दाग लेकर जाओगे।


गलत नम्बर का चश्मा

याद में उस हकीम की
पढ़ता हूँ कविता को दवा के पुर्ज़े की तरह
नब्ज़ देखे बिना ही जो दवा की पुड़िया बाँध देता था

कसैले वक़्त में बढ़ाता हूँ हाथ
शहद की जगह हाथ में सल्फास आ जाता है

कुछ का कुछ दिखता है अब मुझे
जानता हूँ उसकी याद गलत नम्बर का चश्मा है।


गुड़ की डली

गूँगी नहीं हो जाती है आत्मा
न ही होश खोती है

सही गलत दिखता है उसे सब 
बस वह बोल नहीं पाती है

प्रेम आत्मा के मुँह में घुलती गुड़ की डली है।


आसान विकल्प

कविता एक आसान विकल्प है

अंट जाओगी तुम भी
कविता में धीरे-धीरे
ज़िन्दगी में नहीं
कविता में हमेशा होती है गुंजाइश।


अन्न-जल

तुम्हारे पास आकर मैंने
अपनी भूख को जाना
तुमसे दूर रहकर अपनी प्यास को

तुम्हारे पास ही तो मेरा अन्न-जल है।
***



परिचय

जन्म : 28/04/1977
शिक्षा : विधि स्नातक
सृजन : कविताएँ विपाशा, सेतु, आकंठ, जनपथ, समावर्तन, दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि पत्र-पत्रिकाओं के अलावा असुविधा, पहली बार, अजेय, अनहद, आपका साथ, साथ फूलों का व पोषम पा ब्लॉग्स पर प्रकाशित एवं आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के शिमला केंद्र से प्रसारित। चार युवा कवियों की कविताओं पर कोलकत्ता के कवि-आलोचक श्री नीलकमल द्वारा सम्पादित काव्य पुस्तक "सम्भावना के स्वर" में कविताएँ शामिल तथा "समावर्तन" साहित्य पत्रिका के मुख्य संपादक श्री निरंजन क्षोत्रिय जी ने अपनी पत्रिका के युवा कविता पर आधारित चर्चित स्तम्भ "रेखांकित" में कविताओं को शामिल किया है।
सम्प्रति : वकालत

पता : चैम्बर नंबर 145, कोर्ट काम्प्लेक्स, पौंटा साहिब, जिला सिरमौर, हिमाचल प्रदेश।
मोबाइल : 9418467632, 7018503601
ईमेल : sainik.pradeep@gmail.com

Monday, July 6, 2020

शून्‍यकाल में बनी सहमतियों के विरुद्ध - गणेश गनी की कविताऍं

गणेश गनी सुपरिचित कवि हैं। वे पारखी सम्‍पादक और संवादी समीक्षक भी हैं।  उनकी आठ कविताऍं अनुनाद को मिली हैं। कविता और समीक्षा में उनकी सक्रियता को उन्‍हीं के शब्‍दों में कहें तो शून्‍यकाल में बनी सहमतियों के विरुद्ध एक आपत्ति की तरह देखा जा सकता है। कवि का अनुनाद पर स्‍वागत है।  

आख़िरी बात के स्वर और व्यंजन

जिन लोगों को लगता है कि
जब किसी रोज़ अगर भाषा ही मर जाए
तो कितना कुछ अनकहा छूट जाएगा
वो पीड़ादायक होगा
जब अपनों से सम्वाद टूट जाएगा।

ऐसे समय में भी रहेगी जीवित
चिड़ियों की बोली
तितलियों का व्याकरण
बत्तखों की वाणी
बाघों के संकेत
आदिवासियों की भाषा
उनके विलुप्त होने तक।

भाषा तो तब भी मार दी जाती है
जब प्रश्न पूछने पर 
ज़ुबान खींच दी जाती है 
जब असहमति के शब्दों का
या तो गला घोंट दिया जाता है
या फिर कारावास की सज़ा सुनाने के बाद
कान फोड़ दिए जाते हैं।

शून्यकाल में इस बात पर सहमति बनती है
कि कील दिया जाए एक एक कर
शक पैदा करने वाले शब्दों को
अब इन्हें कौन समझाए कि आवारा हवा है भाषा 
जिसे खूंटी से नहीं बाँधा जा सकता
फिर भी हमारी भाषा में
सारे शब्द स्त्रियों के कहाँ हुए
कुछ हिंसक शब्दों पर
अधिकार केवल पुरुषों का है।

सभ्य भाषा की मृत्यु के बाद
एक शंका तुम्हें 
यह भी हो सकती है कि
मनुष्य अंतिम सांस लेने से पहले
किस भाषा में आखिरी बात कहेगा
अंतिम दर्शन और शोकसभा की तैयारी में 
आसपास बैठे लोग
जब विलाप करेंगे तो 
गले में जो कम्पन होगी, वो किस भाषा में होगी!

कुछ खुरदरे बोलों का मिटना ही बेहतर 
जितनी ज़रूरत होगी बोलने की
उतनी भाषा का बनना तय है
भाषा का भूगोल पृथ्वी जैसा है
आख़िरी बात के शब्दों के अक्षर
वास्तव में वर्णमाला के व्यंजन होंगे
और विलाप के वक़्त की ध्वनियां ही
असल में स्वर होंगे
वर्णमाला का तिलिस्म बना रहेगा
यही एक असली भाषा होगी
इससे अधिक न बोला जाएगा
और न ही सुना जाएगा
भाषा ज़ुबान की गुलाम कब हुई
जिस समय यह कविता लिखी जा रही थी
ठीक उस भोर पृथ्वी के किसी कोने में
तुम्हारी उँगलियाँ भी कोई राग बजा रही थीं।


अबूझ पहेली सुलझाने के करीब

बहुत दिन बीत चुके
उसे नहीं देखा, जहां वह अमूमन दिख जाया करता था
अक्सर तेज़ तेज़ कदमों से चलते हुए 
वह झलक भर दिखता और गायब हो जाता 
दरअसल उसे बैठे हुए पाया ही नहीं गया कभी।

कहाँ गया होगा जबकि यह चौराहा उसका अपना था
उसकी आपसदारी नदी से थी
पुल के नीचे बहती हवा से थी
नदी के पत्थरों की फिसलन के विपरीत
उसके तलवे तो खुरदरे थे।

उसे अक्सर बजौरा पुल को 
पार करते हुए देखा जाता
उसका दाहिना हाथ 
कमर से थोड़ा नीचे खिसका पायजामा थामे रहता
बायां हाथ अदब से सीधा तनकर झूलता
उसकी एड़ियों में पहाड़ी नदी जैसा उछाल रहता।

उसके नङ्गे पैरों की बिजली भरी चाल बताती कि
कोई ज़रूरी काम उसे याद आया है
और बरसों से अधोए बालों की
लम्बी लड़ियों के बीच से झाँकते
छितराई दाढ़ी वाले चेहरे की चमक बताती है कि
कोई अबूझ पहेली सुलझाने के वो बहुत करीब है।

उसकी आंखों ने कई सितारों की चमक 
अपने भीतर अवशोषित की है
यह सपनों से आगे, बहुत आगे की रोशनाई है
उसकी दृष्टि से लगता कि
नज़र सामने क्षितिज पर सीधी टिकी है
मगर वह अंतरिक्ष में 
एक दूसरी पृथ्वी को निहार रहा होता।

गोरा सुख-दुःख और रिश्तों के बंधनों से
बहुत ऊपर उठ चुका हुआ लगता
वह उल्लास और शोक एक ही भाव से मनाता 
एक और ज़रूरी बात
उसने दुनिया में दो कठिन काम साध लिए थे
अब वह भूख और नींद को जब चाहे
उड़ा देता और
जब चाहे स्वयं बुला लेता
पिछली बरसात की रात में आई बाढ़ के बाद
गोरा इस पृथ्वी पर देखा नहीं गया।
                       

कविता लिखने की प्रक्रिया के बीच में

दरअसल हम दो ध्रुव थे
कब कविता 
फैलती गई भूमध्यरेखा के आरपार
पता ही नहीं चला
शब्दों की साँसों की गर्माहट से
सारे ग्लेशियर पिघलने लगे
और एक विराट फैलाव
ध्रुवों को छूकर 
मध्य की रेखा को मिटाकर 
छाया रहा पृथ्वी पर
यह कविता की रोशनी ही तो है
कि सारे रंग एक साथ खिल उठते हैं।

वो आदमी एक पूरी डायरी है

किसी पृष्ठ पर दुःख
किसी पन्ने पर बेचैनी
किसी वर्क पर उदासी
आवरण पर अवसाद रहता है
कभी किसी डायरी में 
बसन्त नहीं खिलता।
उसे मत खोलना

वो आदमी एक पूरी डायरी है।

उसके विद्रोही स्वर शासन को रास नहीं आए
तो उसे भीड़ में बदलने के प्रयास हुए
कि झुण्ड के पास बदलने के लिए
कुछ नहीं बचता
केवल आदेश सुनते हैं उसके कान।

ऐसे समय विचारों को ही
बन्दीगृह में डाल 
जड़ दिया जाता है ताला
दोस्त हमारा मस्तिष्क 
तब बन जाता है हमारा किराएदार।

जब जब लगता है कि
देश में सरकार नहीं है 
दरअसल तब तब विपक्ष बीमार होता है
और ऐसे वक़्त सड़क किनारे
काले घोड़े के खुर से गिरी नाल से
छल्ले बनाने वाला भी
क़िस्मत बदलने की ज़ुबान दे सकता है।


इस बीच पता ही नहीं चला

अंतरिक्ष में 
तारों और नक्षत्रों के जन्म और मृत्यु के बीच
एक दिन पृथ्वी पैदा हुई
पृथ्वी पर
धीरे धीरे सृजन होता रहा
हवा, पानी, आग के बाद
जंगल उगे
जीव पैदा हुए
इसी क्रमिक विकास में एक घटना घटी
और मानव अस्तित्व में आया
सबसे ख़राब घटना तब घटी
जब डर ने जन्म लिया
और देवता बनाए जाने लगे
और डर बढ़ता गया और देवता भी
इस बीच पता ही नहीं चला
कब देवता  डराने लग पड़े!


मिट जाने का हुनर

बादलों का यही गुण है कि
वो बारिश की बूँदों को बड़ी सफ़ाई से
छुपाए रख ऊंचाई पर उड़ते रहते हैं

एक और अदभुत हुनर भी है बादलों में
भर जाते हैं और भी
जब उड़ नहीं पाते तो
बरस कर मिट जाते हैं
बादल फिर जन्म लेते हैं

मुझे भरा हुआ 
बादल होना है।


पानी और अक्षर

काली तख़्ती पर सफ़ेद सफ़ेद हर्फ़ 
जब बहते पानी में धुलकर आगे का सफ़र तय करते 
तो दरिया रुककर इन्तज़ार करता
उसे उम्मीद रहती कि 
पाठशाला के करीब से बहता झरने का पानी 
कभी न कभी तो 
नन्हें हाथों की कलम से चीन्हे जीते जागते शब्दों को 
उस तक बहा लाएगा। 

और फिर एक दिन 
सफेद मिट्टी से चीन्हे चमकदार अक्षर 
बहते हुए दरिया तक पहुंचे
अक्षर आगे बढ़ते गए
दरिया अब और तेज़ बहता गया
पानी इन्हें अपनी हथेली पर रखकर 
सागर तक पहुंचाना चाहता था। 
इसलिए दरिया ने पानी से कहा, और तेज़ चलो। 

इस बीच पाठशाला के पीछे 
बर्फ़ से लकदक पहाड़ से फूटे झरने का पानी 
उदास रहने लगा
उसे एहसास हो गया कि 
जिन अक्षरों को वह बहा आया नीचे दरिया तक
वे तो कविताएं निकलीं!

झरना अपनी कविताएं वापस चाहता है कि 
उसे हवा को यह कविताएं लौटानी हैं
ऐसे में कविताओं का क्या दोष! 

रात के अंतिम पहर ज़रहियूं की चोटी पर 
बर्फ़ में बैठा चाँद देख रहा है कि 
बहुत दूर मैदान में चनाब के इस पार तट पर 
हीर पानी की सतह से चुन चुनकर कविताएँ 
रेत पर लेटे अपने रांझा को सुना रही है 
और दरिया के उस पर 
महिवाल अपनी गोद में सर रखे सोहनी को 
मीठे पानी से भीगे आखरों को पढ़कर सुना रहा है। 

इधर झरना सोच रहा है कि 
कब सूरज निकले 
और पाठशाला पहुंचे उस नन्हें बालक के 
पाँव भिगोकर आभार जताया जाए।
 
ताकि डरावने प्रश्न टाले जा सकें

बाहर लगभग अंधेरा जैसा ही है
परंतु यह अंधेरा कुछ ऐसा है 
जिसका वर्णन करना  बड़ा ही असम्भव है
इसे केवल देख कर ही महसूस किया जा सकता है
जैसे कोई पूछे कि 
रात के समय जो ढिबरी जल रही थी
उसकी रोशनी कितनी थी!

फिर भी एक आदमी 
अपनी दृष्टि बादलों के पार डालता है 
और कहता है
दोपहर से अधिक का समय हो चुका है 
और छत पर एक हाथ बर्फ़ बैठ चुकी है
रात ढलने से पहले पहले इसे हटाना होगा।

छत के एक किनारे से 
बर्फ़ हटाने का काम शुरू होता है
जब तक दूसरे किनारे तक पहुंचते हैं
तब तक छत का साफ किया हुआ भाग 
फिर से बर्फ़ ढक देती है। 

रात ढलने लगी है 
मगर हिमपात रुक नहीं रहा
सिर, कंधों और पीठ पर जमी बर्फ़ को झाड़ने के बाद 
बर्फ़ हटाने के लकड़ी के किराणु 
घर के एक कोने में पंक्तिबद्ध खड़े रखकर 
अब सभी आग के आसपास बैठ गए हैं 
एक घेरा बनाकर। 

घर के बीचों बीच लोहे की तिपाई पर भी 
रोशनी के लिए आग जलाए रखी है
कठिन समय है
तो नींद भी कठिन है आना
न जाने सुबह तक क्या होगा
ऐसे कई प्रश्न मन में उठ रहे हैं तो 
अखरोट तोड़ने वाले गिरियां जमा कर रहे हैं 
ऊन कातने वाले तकलियाँ घुमा रहे हैं
मुश्किल समय ज़रा धीरे चलता है
इसलिए घर के कुछ सदस्य समय काटने के लिए 
पहेलियां भी पूछ और बूझ रहे हैं 
ताकि डरावने प्रश्न 
कम से कम कुछ समय के लिए टाले जा सकें। 
             
- गणेश गनी, कुल्लू
  9736500069

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails