Friday, August 7, 2020

पिछले शरद के पहले नए थे नीलकुरिंजी के फूल – कुशाग्र अद्वैत की कविताऍं

कुशाग्र अद्वैत बाईस बरस के नौजवान हैं, जिनके पास कुछ विशिष्‍ट जीवनानुभव हैं, जैसे हर नौउम्र इंसान के पास होते हैं। कुशाग्र जीवन की सांद्रता को कुछ सजग हो और कुछ चौंकते हुए-से देख और ऑंक रहे हैं। उनकी कविता में हताशा और आशा के बीच गॅूंजती एक युवक की जो आवाज़ है, वह दरअसल उनके जैसे अनगिन युवकों की आवाज हैं। बिना मोह में फँसे वे स्‍मृतियों के साथ रह लेते हैं और अपने उस रहवास से कुछ चकित-से प्रश्‍न पूछते हैं। एक नया संसार, एक नयी-सी लगन और किसी अमूर्त ठोस को पिघला कर आकार में बदलता हुआ एक विकल मानवीय शिल्‍प इन कविताओं में हैं।

उसकी कविताओं के माध्यम से/ईश्वर को बसन्त के आगमन की/ आधिकारिक घोषणा करनी थी इस घोषणा का अनुनाद स्‍वागत करता है।
  

   कवि का कथन   


यह एक थके-हारे आदमी की कविता है। जो कभी इस्केपिस्ट-सा रवैया अख़्तियार करता है और कहीं दूर भाग जाना चाहता है। प्रेम भी उसके लिए इस कुरूप यथार्थ से बचने का प्रयास है, एक खोह है या कहिए एक किस्म का इस्केपिस्म ही है। यह सब करने के बावजूद वह जैसा जीवन ख़ुद जी रहा है, दूसरे के लिए वैसा जीवन नहीं चाहता। वह अपने सिवा हर किसी को भगौड़ेपन, उदासी और हताशा के इस गहरे-अँधेरे-असीम कूप में गिरने से, गिरते रहने से बचाने की बेकार कोशिश करता है, कोशिश क्या करता है बस सवाल पूछता है। बेहद मासूम-सा सवाल। जिसका अमूमन किसी के पास कोई जवाब नहीं होता।

फिर यहाँ स्मृतियों का एक जाल है। पुरानी-सुंदर स्मृतियाँ; घेरेदार। पुरातनता अपने साथ एक अलग किस्म की सुंदरता लाती है। वह मक़बरे-सी, कला वीथिकाओं-सी सजीली सुंदरता भी हो सकती है। वह नॉस्टेल्जिया-सी जीवित सुंदरता भी हो सकती है। यह ज़रूरी भी नहीं कि नॉस्टेल्जिया हर किसी के लिए और हर बार सुंदर ही हो। वह असुंदर भी हो सकती है। यह भी हो सकता है कि कल जो असुंदर था, वह आज सुंदर लगे। मसलन, गरीबी में जीते बखत किसी को आनन्द नहीं आता, लेकिन जब वह दौर बीत जाता है तब उसके बखान नहीं चुकते। फिर हाल(वर्तमान) है। दुनिया है विस्मृति को गले लगाती हुई, सबकुछ भूल आगे बढ़ती हुई, अतीत से, परम्परा से पीछा छुड़ाती हुई-सी। 

मेरी कविता इन दोनों अतियों के बीच कहीं सम्भव होती है। बुद्ध के मध्यममार्ग के अपने अर्थ थे। मैं उस मध्यममार्ग को जीवन में उनसे अलग और कत्तई निजी अर्थों में लेता हूँ। किसी एक धारा के साथ बह सकने के लिए अपनी sanity नहीं तज सकता। गलत को सही और सही को गलत नहीं ठहरा सकता। किसी को पूरम-पूर सही भी नहीं मान सकता। इन अर्थों में यह एक मध्यममार्गी की कविता है। स्मृति-विस्मृति के बीच कहीं सम्भव होती है। ऐसी ही और दूसरी चीज़ों के बीच कहीं सम्भव होती है। दोस्त, बाज़ दफ़ा यह समझ लेते हैं कि यह मध्यम मार्ग न्यूट्रेलिटी है, एक किस्म की तटस्थता है। लेकिन, ऐसा है नहीं। यह सच और सौंदर्य के पक्ष में लिखी हुई कविता है। सच और सौंदर्य के की वक़ालत में लिखी हुई कविता है
- कुशाग्र अद्वैत

सोलह बरस के लड़के की कविताएँ

एक सोलह बरस के लड़के की कविताओं के बिम्ब
इतने कुरूप क्यों हैं?

यहाँ
मगरमच्छ क्यों हैं,
रंग-बिरंगी मछलियाँ क्यों नहीं?

कोई पूछता भी नहीं
सोलह बरस के कवि से
कि यहाँ तो सोता होना था
फिर इतनी प्यास क्यों हैं?

हरदम महकती रहनी थी यह जगह
इत्र होते या कुछ और
फिर, चिमनियों का-सा धुआँ क्यों हैं?
रंग-बिरंगी तितलियाँ क्यों नहीं?

सोलह बरस के लड़के को तो
शुतुरमुर्गी चुम्बन में डूब जाना था,
या कोई अश्लील किताब ले
बिस्तर में ही लुका जाना था

उसकी पथरीली आँखों को
किसी की सजीली आँखों के आगे
सहसा ही झुक जाना था,
दो कदम आगे आना था
तीन कदम पीछे,
फिर असमंजस में
बीच में ही कहीं रुक जाना था।

उसकी कविताओं के माध्यम से
ईश्वर को बसन्त के आगमन की
आधिकारिक घोषणा करनी थी।

उसकी कविताओं में हुई
नुक़्तों की गलतियाँ
आलोचकों को
आकाश से छिटके तारों-सी लगनी थी।

उसकी कविताओं के आकाश को नीला
और धरती को असामान्य रूप से हरा होना था।

उसकी कविताओं में
मधुमक्खियों को छत्ता लगाना था,
कोयलों को घोंसला बनाना था।

उसकी कविताओं के आसपास
होना चाहिए था

एक अद्भुत प्रकाश
किसी लैम्पपोस्ट की तरह
कीट-पतंगों को जहाँ डेरा जमाना था।

उसकी कविताओं में
उपासना,
विपासना,
सपना
लड़कियों के नाम होने थे।

और, वासना?
वासना
किसी ऋतु की!

लेकिन,
उसकी कविताओं के बिम्ब
इतने कुरूप हैं
और,
कोई पूछता भी नहीं
कि यहाँ तो सोता होना था
फिर इतनी प्यास क्यों हैं?
2018


कोई नदी सदा नदी न थी

कोई गीत
उतरते ही
न आया था
तरन्नुम में

कोई पत्थर
सदा
पत्थर न था

न कोई पत्थर
सदा 
ईश्वर था

कोई नदी
सदा
नदी न थी

कोई मरुथल
सदा तो
मरुथल न था!

न मैं सदा मैं था
न तुम सदा तुम

फिर हम कैसे
हो गए
इतने हम!
31 दिसम्बर


उसके पूर्वप्रेमी के लिए

मौसम में शारदीय नवरात्र के
पहले वाली खुनकी है,
एक नन्ही पीली पत्ती
पाँव के नीचे आ दुबकी है

ऐसे ख़ुशनुमा मौसम में भी
वो बेचारा
बेचैन हो रहा है
तुम्हारी बाट जोह रहा है

कर लो उस से बात
ग़र पूछे, बता देना

तबियत ठीक रहती है,
दवा टाइम पर लेती हो,
ज़्यादातर, खुश ही रहती हो

ग़र रोने लगे ज़ार-ज़ार
कह देना

तुम भी करती हो उसको याद
.....कभी-कभार।

कोई समझे न समझे,
एक प्रेमी को समझना चाहिए
दूजे प्रेमी का दुःख।

 
हम साथ मिलकर

हम साथ मिलकर
पकड़ेंगे तितलियाँ*
और उड़ा देंगे

देखेंगे
बहुतेरे सपने

कुछ को करेंगे पूरा,
कुछ को
भुला देंगे

इतवारों को लगाएँगे पुराने गाने,
साथ धोएँगे मटमैले कपड़े
और झाग से खेलेंगे

देर तलक
तरतीब से
घर बुहारेंगे

एक-दो नहीं
पाँच-पाँच बिल्लियाँ पालेंगे

हम साथ मिलकर
बिलकुल अर्थहीन-सी लगती
या बिलकुल अर्थहीन हो गई
या कहो बिलकुल अर्थहीन
कर दी गईं चीज़ों को
बिलकुल नए अर्थ सौंपेंगे

घर के किसी
वीरान पड़े कोने में
नए नक्षत्र गढ़तीं
चींटियों के लिए
मुट्ठी भर आटा डालेंगे

हम साथ मिलकर
अपने डरों के
कपड़े उतारेंगे

फिर रोएँगे
या खिलखिलाएँगे

साझा करेंगे
बचपन की अच्छी-बुरी स्मृतियाँ
फिर बच्चों-से हो जाएँगे

हम साथ मिलकर
आकाश की तरफ़,
मेघों की तरफ़,
पेड़ों की तरफ़,
और-और लोगों की तरफ़
बेहिचक, दोस्ती का हाथ बढ़ाएँगे

अलसुबह, नाश्ते की मेज़ पर
जो गीत किसी एक के मुँह पर चढ़ा होगा
उसको हफ़्ते-दो हफ़्ते
दफ़्तर की अकबक उबासियों में गुनगुनाएँगे

और, शाम गए
जब कहीं मिलेंगे
उदासियों-उबासियों को
रक्तिम सेब समझ
दो-दो फाँक बाँटेंगे
और, काट खाएँगे।

* व्लादिमीर नबोकोव और उनकी संगिनी वेरा, जो उनकी लिपिकार, अनुवादक, सम्पादक, प्रथम पाठक और प्रवाद तो यहाँ तक है कि उनकी अंगरक्षक भी थीं, जिनके साथ मिलकर वे तितलियाँ पकड़ते थे, के स्नेहिल सम्बन्धों को याद करते हुए।

तुम्हारे होंठ मेरे लिए बिल्कुल नए हैं

इन्हें कैसे स्पर्श किया जाए
मेरी उँगलियों के पास
वह कला नहीं है

तुम्हारे होंठ मेरे लिए
बिल्कुल नए हैं

जैसे नई है
यह ऋतु बासन्ती,
जैसे पिछले शरद के पहले
नए थे
नीलकुरिंजी के फूल

तुम्हें चूमने के बाद से ही
मैं नव्यता से ओतप्रोत हूँ

मेरे होंठ
बार-बार रस्ता भटक जाते हैं,
तुम्हारे दाँत
साबित कर देते हैं
उन पर अपना प्रभुत्व
और वो बेचारे
सकुचा कर
कर देते हैं समर्पण
कि जैसे उन्हें यही आता हो

तुम्हारे होंठ मेरे लिए नए हैं,
हर नई शै
मुझे तुम तक खींच लाती है,
हर नई शै
जिज्ञासा को जन्म देती है
जिज्ञासा खोज को

जैसे धरती वाले मंगल पर
जीवन खोज रहे हैं
मेरी जिह्वा तुम्हारे होंठों के पार,
मुख के भीतर
अपने लिए
सिर्फ अपने लिए
जीवन खोजती है
22 फरवरी


अ-पकी सुंदर चीज़ों के लिए/ बुआ की याद

उसकी रसोईं की देहरी पर खड़ा हूँ
चाहता हॉल में बैठता, हवा खाता
पलटता मैगज़ीन, बदलता चैनल
या उसके बच्चे से कुछ बतियाता

वह भी यही चाहती है
तब ही कहती है

"तुम वहीं बैठो आराम से,
कब का निकले होगे!,
थक चुके होगे,
बस बनने को है,
फिर आती हूँ।"

कलछुल हिलाते-डुलाते
जाने क्या पकाते-वकाते
कुछ-कुछ गुनगुनाती है
जिसकी बहुत मद्धम आँच
मुझ तक आती है

उस से कहूँगा यदि
कि तुम्हारे लिए नहीं
इस गीत के लिए खड़ा हूँ
वह सचेत हो सकती है
गाना रोक भी सकती है

मेरी पसंदगी का इक नाज़ुक सिरा
जुड़ा है ऐसी अपकी सुंदर चीज़ों से
जिसे करते हैं लोगबाग़ बेध्यानी में
या यूँ ही, कभी-कभार, शौक़िया
जैसे नाचती थी मेरी छोटी बुआ

कभी बेध्यानी में तो कभी शौक़िया
बिजुली गुल होने पर तो अक्सरहाँ
हर नए गाने पर ख़ुद को आज़माती
कभी बजता गाना, कभी ख़ुद गाती
दूर से जाती रेल की आवाज़ आती

कभी पकड़ती मेरी छोटी ऊँगली
गोल-गोल घूमती, मुझे भी नचाती
क़मीज़ में पचरंगी दुपट्टा लपेट लेती
कमरे की तरफ़ किसको आने देती

कभी ऐश्वर्या, कभी माधुरी
कभी वो श्रीदेवी होती
नाचते-नाचते हँसने लगती
नाचते-नाचते नदियाँ रोती।
जुलाई 2020
***

Tuesday, August 4, 2020

विपदाऍं नया रच कर जाती हैं - आशीष कुमार तिवारी की कविताऍं


   कवि का कथन   

कविताएँ तो मैं स्नातक से ही लिखने लगा था लेकिन सचेत रूप से लिखने का क्रम परास्नातक (2017) के बाद से शुरू हुआ। इन तीन वर्षों में बहुत कुछ देखा राजनीति में निर्लज्ज सांप्रदायिकता, तमिलनाडु-मध्यप्रदेश से पैदल दिल्ली चलकर जाने वाले किसानों का विद्रोह देखा, अभिव्यक्ति पर पाबंदी, छात्रों-नौजवानों पर ज़ुल्म, नागरिकता पर सवाल, श्रेष्ठताबोध में एक की संस्कृति को दूसरे से निम्न दिखाने की भावना....बहुत दॄश्य थे जो विचलित करते थे और करते आ रहे हैं। विपदाओं में भी राजनीति का कुत्सित रूप उभरकर आया, मूर्खता का प्रसार राष्ट्रीय विवेक की तरह किया जा रहा था। 
 
ऐसे में यदि मेरी कविताओं में राजनीति का प्रभाव अत्यधिक झलके तो इसमें मैं बुराई नहीं मानता। राजनीति ने प्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन को दबोच लिया है। इसलिए कविता का राजनीति से निरपेक्ष होना मानव जीवन और समाज से अन्याय होगा। कविता पर भरोसा हमें करना है। मैं अपनी अधपकी भाषा के साथ कविता लिखकर अपना विरोध दर्ज कर रहा हूँ। कला-कौशल विहीन हो सकती हैं ये कविताएँ परंतु इन परिस्थितियों में विरोध यहां मिलेगा। इन कविताओं में मेरी मिट्टी, घास-फूस और पेड़ों की पत्तियां अपनी झलक के साथ मिलेंगी। आपसे आग्रह है जरा ठहरकर इन कविताओं में झांकियेगा। 

- आशीष कुमार तिवारी


देवासुर विद्या 

असुर वे कहलाये गए
जिनके गुरुओं ने उन्हें स्वर्ग-विजेता बनने के गुर सिखाए
असुरों के गुरु को, गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया गया

जिनके शिष्य महाव्यसनी थे,
जिनके शिष्यों की विलासिता,
किसी असुर शिष्य की विलासिता से कम न थी
वे गुरु देव-पूजाओं में दुहराए जाते हैं

असुरों के गुरु ने उन्हें विजय-कौशल के मंत्र दिए
सृष्टि-रचयिताओं से वरदान लेने योग्य कठिन साधना, तप का दृढ़ संकल्प सिखाया
रचयिताओं को बार-बार विवश किया इच्छित वरदान देने के लिए
असुर थलचर थे,
उन्होंने आकाश में युद्ध-कलाओं से देव-शिष्यों को अनेक बार पराजित भी किया
संभव था वे उन वरदानों का सदुपयोग भी सीख जाते,
लेकिन आचार्य शुक्र जैसा प्रतिबद्ध गुरु उन्हें दुबारा न मिला

आचार्य बृहस्पति इंद्र की मूढ़ताओं से दुखी रहते थे
परंतु देव-सत्ता का त्याग वे न कर पाए
जाने किस लाचारी में वे अपनी विद्याओं का लोप होता देख रहे थे
देव-निर्मित जिस गुरुत्व-बल को तोड़कर
असुरों का स्वर्गारोहण हो रहा था उससे वे चकित थे
वे इंद्र से अपेक्षा करते थे कि वह एक नया स्वर्ग भले न बना पाए
कम-से-कम निर्मित स्वर्ग को अपने पराक्रम से बचाये रहे
जिससे उनकी विद्याओं का प्रभाव बना रहे
परंतु देवतागण दैवीय-भार से ग्रसित थे
विद्या-प्रभाव उनमें असुरों से लघुतर था

देव-गुरु की पदवी छोड़कर गुरु बृहस्पति एक प्रयोग यदि कर पाते
कि आचार्य शुक्र के साथ मिलकर एक महाअभियान
असुरों के पक्ष में करते
तो योद्धाओं का इतिहास इस महादेश में कुछ और होता
तब जो आचार्य परंपरा विरासत में मिलती,
वह
देवासुर संग्राम को न जन्म देती
बल्कि
देवासुर विद्या-संस्कृति को शिल्प देती....




मिट्टी-चोर बच्चे

किसी ने कहा कि मोहल्ले के बच्चे 
आपके प्लॉट की मिट्टी चुरा रहे
मैंने भी देखना चाहा
देखा कि छोटे-छोटे बर्तनों में बच्चे मिट्टी भरके ले जा रहे
वे उन्हें गमलों में डाल रहे थे
कुछ गमलों में तो सुंदर-सुंदर फूल भी खिले थे

कुछ पल के लिए तो लगा कि वे सारे फूल मेरे हैं
क्योंकि वे मेरे प्लॉट की मिट्टी में उगे हैं 
फिर उन बच्चों के चेहरों पर ध्यान गया
जो उन पौधों को सींचते

ये बच्चे बड़े नादान होते हैं
गमले तैयार करना वे खेल समझते हैं
उन्हें नहीं पता 
वे मिट्टी चुराकर फूल खिला रहे

जब उन गमलों में खिले फूल देखता हूँ 
तो उन फूल जैसे बच्चों के चेहरे याद आ जाते हैं

तब मन हंसकर कहता है
ले जाओ!
सारी मिट्टी चुराकर ले जाओ
सारी मिट्टी को फूल बना दो

नहीं तो ये सारी मिट्टी शहर के बोझ तले दफ़न हो जाएगी

बच्चों! जब ज़मीन पर इमारतें उतर आएं
तो उन इमारतों के सिर पर
एक गमला मिट्टी भरकर रख देना
ताकि उन्हें एहसास रहे
मिट्टी ही सत्य है
मिट्टी ही शाश्वत है।


सबसे बड़ी महामारी से लड़ती दुनिया

महामारियां सभ्यताओं के चेतने का दौर होती हैं
बीते समय की छलनाएं उसकी पायदान बनती हैं

धरती पर पहली महामारी जब भी आई होगी
वह – भूख रही होगी
भूख का स्थायी इलाज़ आज तक न मिला
न ही उचित प्रबंध

भूख को छला गया
ये महामारी धरती से मिटी नहीं
इससे होने वाली मृत्यु के आंकड़े कहीं भी दर्ज़ नहीं
किसी पोस्टमार्टम हाउस में ऐसी लाशों का परीक्षण नहीं हुआ 
यदि किया गया होता तो शायद भूख के बिलबिलाते कीड़े निकलते
कहते हैं पेट में भूख के कीड़े नहीं,
भारी-भरकम नरभक्षी चूहे होते हैं
ये चूहे अंतड़ियों को चबा जाते हैं

अब जब भी कोई नई महामारी आती है
इन चूहों का खेल शुरू हो जाता है
तय करना कठिन होता है – पहले किससे मरेंगे

दूसरी बड़ी महामारी नफरत और भेदभाव 
इसके कीड़े पेट में नहीं,
दिमाग में पनपते हैं
इस महामारी में खून सड़कों पर बहता है
हाथ,पांव, गर्दन कटे मिलते हैं
भयावहता यह कि इसमें घर-मकान,दुकान जलते हैं
औरतों की इज्जत लूटी जाती है
बच्चे अनाथ होते हैं
हंसते-खेलते परिवार तबाह हो जाते हैं
और यहीं से बात फिर भूख पर लौट आती है
इस माहौल में पीड़ित कई दिन भूखे रोते-तड़पते रहता है

कई महामारियां भटक रहीं गलियों में
अगर भूख और दिमाग की महामारी जीत ली गई होती
तो शायद हम अन्य से बेहतर ढंग से लड़ पाते

  
मूर्खता को राष्ट्रीय विवेक घोषित किया जाना चाहिए

राष्ट्र विपत्ति में हो 
तो निवासियों का विवेक उसकी पूंजी होती है
महामारियां आती हैं और मानवता को त्रस्त करती हैं
पर मूढ़ता जब दबे पांव विवेक का हरण कर ले
तो राष्ट्र की रक्षा संभव नहीं

मूर्खता महामारियों का वैधानिक सत्यापन 
राष्ट्र के माथे पर करती है
पर इससे पहले की प्रक्रिया है,
मूर्खता को राष्ट्रीय विवेक घोषित किया जाना।

ये दोहरी आपदा है मानवता पर
जब, उसके पास न राष्ट्र होगा, न विवेक।

मूर्खता शोक को हास्य में परिवर्तित करना चाहती है
मूर्खता को मूर्खता करने के लिए भी 
थोड़ा बहुत विवेक तो चाहिए ही…
वह नहीं जानती
शोक को हास्य में बदलने की कोशिश में पागलपन पैदा होता है

यह महामारी के विस्तार का सुंदर समय होता है
तल में महामारी और सतह पर मूर्खता का फेन
जो राष्ट्र इसमें फंसा, 
वहां बस पीड़ा बचेगी
मृत्यु बचेगी।

इस तरह कोई भी महामारी दोमुंही होती है। 


विपदाएं नया रच कर जाती हैं

इन दिनों अनेक दृश्य मौजूद हैं
ये दृश्य किसी को प्यारे नहीं हैं
पर सभी मजबूर हैं इन अप्रत्याशित दृश्यों की नियति से

क्या कभी आठ साल का बच्चा
आठ सौ मील की यात्रा पैदल तय करेगा..?
वो उसे ज़ाहिल भले कह लें
पर क्या गर्भवती स्त्री भरी कोख़ और खाली पेट
पैदल एक राज्य से दूसरे राज्य जा पाएगी..?
पर…
वो जाएगी और जीवट को जन्म भी देगी

कितना कुछ रच कर जाएंगी ये विपदाएं
विपदाएं अनजाने में क्षमताओं को रच जाती हैं
बाढ़ से उपजी विपदा विशाल बांधों की ओर,
सूखे की विपदा गहरे कुओं की ओर।

समुंदर उस पार के देश में जलता चूल्हा
इस पार के चूल्हे में आग भले न जला सके
पर घर जरूर जला सकता है।
जैसे विपदाएं आयीं और सब तक पहुंची
वैसे सब अपने घरों तक क्यों नहीं पहुंचे..?
विपदाओं की गति तेज है,
समाधान ठेलने पर भी न पहुंचेगा।

जब सब कुछ असंगत है
तो क्या जरूरी है कि मेरे सारे सवाल संगत ही हों..?
मन करे तो खारिज़ कर देना। 

जब दुनिया ठीक हो जाए

फूलों से लदा कोई पौधा, कोई पेड़
किसी कागज़ को रंगते रंगीन ब्रश की तरह
रंग रहा होता है
थोड़ा सा आसमान,
थोड़ी सी ज़मीन

इस रंगाई में कितना रंग खर्च होता होगा
इसका अंदाज़ा लगाना कितना मुश्किल है
ऐसे फूल किस चित्रकला शैली से बनते होंगे
कौन इनका चित्रकार है
इनकी महक किस नाम से जानी जाती होगी
ऐसा कुछ निश्चित नहीं

इंसानों की दुनिया जब हताश है
बचने-बचाने की कोशिशों में जुटी है
तब भी सूरज अपने वक्त पर उग रहा है
भोर की आहट पाकर अब भी चिड़ियों की चटकार फूट रही
मंथर गति की हवाएं अब भी सुकून दे रहीं

इन लदे भार फूलों ने अपनी महक से
दुनिया को सुगंधित करना जारी रखा है
सब मिलकर दुनिया को रंगीन और सुगंधित कर रहे हैं
उम्मीद की डोर मजबूत कर रहे सभी
फिर दुनिया डोलेगी
और इन पौधों और फूलों की भूमिका को याद रखकर
भविष्य के संकटों से इन्हें भी बचाने का प्रण लेगी

ये निभा रहे अपना दायित्व
उम्मीद है,
दुनिया ठीक हो जाये तो लोग भी निभाएं इनके साथ वफादारी।
 

देह की मिट्टी बचाने के लिए

वे जब पैदा हुए तो घर मिट्टी का बना था

मिट्टी में ही खेले
मिट्टी में ही पले-बढ़े
कभी-कभी शौक़ से मिट्टी खाई भी

उन्हें लगा कि मिट्टी ही सब कुछ है
मिट्टी के चूल्हे,
मिट्टी के बर्तन,
मिट्टी के खिलौने
और घर की दीवारें भी मिट्टी की थी

उन्हें लगा कि मिट्टी ही सब कुछ है
इसीलिए खेतों की मिट्टी से उन्हें प्यार था
पूरा परिवार चारों ऋतुओं में मिट्टी को चूमता रहता था
मिट्टी उनके लिए सब कुछ थी

जब सभ्यता ने खुद को आधुनिक घोषित कर दिया
मिट्टी का मोल मिट्टी बराबर साबित किया जाने लगा
और 
मिट्टी को मिट्टी के मोल खरीदकर
भट्टों में महंगे ईंटें बना दी गईं

उनसे मिट्टी का भरोसा छीन लिया गया
नम मिट्टी को ठोस ईंटों में बदलने का काम जारी था
ये मिट्टी के बने इंसान
अपनी मिट्टी को ईंट बनता देखकर निस्सहाय हो चुके थे

उनके पाँव तले की मिट्टी दिनोंदिन खिसक रही थी
अब वे अपने शरीर की मिट्टी को 
गलने से बचाने के लिये 
ईंट के भट्ठे में अपने पूर्वजों की मिट्टी झोंक रहे थे।
***
 
आशीष कुमार तिवारी
शोधार्थी, हिंदी विभाग
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
96969994252


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