
अपने बच्चों में ख़ुदा की सूरत देखती माँओं को क्या ज़वाब दोगे तुम/कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएं
कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएं पहाड़ की सड़कों की तरह मोड़दार हैं। वैश्विक दृश्यों में चलती हुई, अचानक से संवेदनाओं में लौटती इन कविताओं का

कुँवर रवीन्द्र सिंह की कविताएं पहाड़ की सड़कों की तरह मोड़दार हैं। वैश्विक दृश्यों में चलती हुई, अचानक से संवेदनाओं में लौटती इन कविताओं का

ज्योतिकृष्ण वर्मा की ये कविताएं आकार में छोटी और कहन में बड़ी हैं। हमारे आस-पास के रूपकों को बरतते हुए वे आख्यान के रूप में

अनामिका अनु की कविताओं का स्वर अलहदा है। उनकी एकान्तिक अनुभूतियों में भी एक अलग तरह की सामूहिकता है, जो पाठक को इन कविताओं से

पल्लवी की कविताएं समाज में व्याप्त विसंगतियों,पाखंड से संवेदना भरे मन में होने वाली उथल-पुथल को सामने लाती हैं। इन विसंगतियों से पार पाने के

दोनोँ रचनाओँ की अन्यत्र अस्वीकृति के कारण निम्न हैँ: – महाकवि पिण्टा की अस्वीकृति के कारण इस तरह बताए गए थे –१. विद्वेषपूर्ण रचना –

मैं अपनी शोक सभा का कार्यक्रम सुन रहा था। सुनना ही था; देख तो नहीं सकता था, क्योंकि जमीन पर तो कुछ हो नहीं रहा

बैजनाथ मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में गोमती नदी के किनारे बसा है, जो अल्मोड़ा से लगभग 70 किमी उत्तर-पश्चिम में है। ये कुमाऊँ हिमालय

2003 के क्रिकेट विश्व कप के समय मैं सत्रह साल का था। किराए पर कमरा लेकर अलवर में रहता था। वह पहली बार घर से

बहुत दिनों से वह अपनी नींद ढूँढ रहा था … कभी कभी वह अपनी रातों की नींद ढूँढ़ते हुए मेरी दोपहर में आ जाता और

छत की मुंडेर से सटकर खड़े पुराने नीम के पेड़ की डाल से पत्तियां तोड़ते हुए, वो ढलती सांझ के सूरज को देख रहा था।




Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.


